A Mother’s True Offering: Nourishing the Soul, Not Just the Body
- ME Holistic Centre
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Updated: 58 minutes ago
As mothers, we often feel our deepest expression of love is through food. We think, “If I make tasty food for my children, they will feel loved.” We try to please their taste buds and, in doing so, unwittingly activate their senses and indulge their cravings. But is this truly helping them?
Why do we all have food? Is it solely to satisfy our taste buds and senses, or is it meant to provide energy, health, and vitality? Sadly, due to a lack of knowledge (agyān), many of us choose food that ultimately undermines our well-being—causing illnesses rather than nurturing strength. Countless individuals have transformed their lives by returning to natural remedies. Consider the recent example of a renowned cricketer’s wife, who was given only a few months to live by allopathic doctors at a late stage of cancer. Yet through naturopathy and natural food remedies, she experienced a miraculous turnaround in less than four months. Similarly, great souls like Sunyogi Baba Umashankar—whom I had the honor of learning sun yoga from—have demonstrated that one can thrive solely on the energy of the sun, having lived for years without conventional food or water.
According to the Bhagavad Gita 3.42:
"Indriyāṇi parany ahur indriyebhyah,
Param manah, manasas tu para buddhir
Yo buddheḥ parataḥ tu sah."
(BG 3.42)
Translation: "The senses are superior to the body; the mind is above the senses; the intellect is above the mind; and the self, the soul, is even higher."
This verse reminds us that true nourishment for a powerful being comes not from merely pleasing the body or its senses, but by cultivating the intellect—the divine spark that guides life.
Yet, in our modern era, children are overstimulated, overfed, and underdeveloped emotionally and spiritually.
A Real-Life Lesson from the Classroom
Years ago, while heading the Department of Architecture in a reputed college in Nashik, I facilitated in-depth personality development sessions during student inductions. One girl from another city revealed she had attempted suicide five times. We were shocked, assuming she must have endured unspeakable trauma.
Her reasons, however, were startlingly trivial—a missed chance at owning a diamond ring during a visit to a showroom with her father, a burnt doll due to a short circuit. For her, these “small” disappointments became overwhelming emotional whirlpools. When her father later remarked, “I’ve given her everything she’s ever asked for—she has been a princess,” the truth became evident. As a psychotherapist, I recognized classic conditioning at work. A child who is always fulfilled never learns to cope with denial; they never build resilience. What seems like love can, in fact, become the cause of deep emotional fragility. This is the "spoiled identity trap"—where unconditional fulfillment breeds a belief that life owes them everything, leaving them unprepared when reality strikes.
Vedas: The Forgotten Blueprint
In ancient Vedic culture, children between the ages of 8 and 25 were meant to live in a Gurukul—a space of discipline, service, simplicity, and focused learning. This stage of Brahmacharya was about building character, controlling the senses, and nurturing the intellect. As the Taittiriya Upanishad teaches:
> "Matru devo bhava, Pitru devo bhava."
Translation: "Revere your mother and father as divine."
Not to be worshipped in ego, but as the first architects of a child's consciousness.
I, too, had to unlearn many beliefs from my affluent upbringing. Today, I live in solitude among farmers, ashrams, and near Gurukuls. I cook on chulhas, use no shampoos, toothpaste, or cosmetics, and haven’t taken an allopathic medicine in over eight years. I grind my food with hand stone mixers—just as the farmers do, where even daily chores double as exercise, eliminating the need for a gym. This lifestyle has brought immense clarity: we do not need to give our children the world; we need to show them how to face it.
From Food to Freedom
True love is not about merely fulfilling immediate desires. It is about building the strength to transcend them. When we feed our children solely to please their taste buds, we risk starving their higher self—the soul that craves discipline, silence, and inner nourishment.
Food, at its purest, is meant to provide energy for life and health. Natural, unadulterated nourishment can heal. Miracles are possible when we choose nature over chemicals—a truth evident in the many miraculous recoveries through natural healing practices.
A Silent Seed for the Future
Deep in my heart, I nurture a vision—a space where ancient wisdom thrives once more. A Gurukul-like system where education, food, and values are freely shared in harmony with nature; where children grow strong not only physically, but also mentally and spiritually. True education, as it once was, was free—not burdened with exorbitant fees—but an exchange of priceless knowledge gleaned from nature itself.
Let the child be bored. In that boredom, he will learn to:
Hear the birds' song,
Feel the caress of the breeze,
Observe the diligent ants,
Converse with the silent trees,
And, most importantly, discover his own inner voice.
No app or achievement can replace this connection.
In Conclusion
Are we feeding their body, or feeding their destiny?
As mothers, our true offering is to nourish not only the physical form but the soul within—with food that energizes, discipline that strengthens, and an environment that awakens the inner self.
—
Manjushree Rathi
Director, ME Holistic Centre
......
एक माँ की सच्ची भेंट: केवल शरीर नहीं, आत्मा का पोषण:
एक माँ होने के नाते, हम अक्सर महसूस करती हैं कि हमारा प्रेम सबसे अधिक हमारे बनाए हुए भोजन में प्रकट होता है। हमें लगता है – “अगर मैं अपने बच्चों के लिए स्वादिष्ट खाना बनाऊंगी, तो वे मुझसे प्रेम महसूस करेंगे।” हम उनके स्वाद को प्रसन्न करने का प्रयास करती हैं, और इस प्रयास में अनजाने में उनके इंद्रियों को उत्तेजित कर cravings को बढ़ावा देती हैं। लेकिन क्या यह सच में उनकी मदद है?
भोजन का उद्देश्य क्या केवल स्वाद की तृप्ति है? या यह ऊर्जा, स्वास्थ्य और जीवनशक्ति प्रदान करने का साधन है? दुर्भाग्यवश, अज्ञान के कारण हम ऐसा भोजन चुन लेते हैं जो हमें बीमार बना देता है, ताकतवर नहीं। लेकिन जो लोग प्रकृति की ओर लौटे हैं, उन्होंने चमत्कारिक रूप से अपने जीवन बदले हैं।
हाल ही में एक प्रसिद्ध क्रिकेटर की पत्नी को कैंसर के अंतिम चरण में डॉक्टर्स ने कुछ ही महीने की जीवन-समयसीमा दी थी। लेकिन प्राकृतिक आहार और नेचुरोपैथी से उन्होंने चार महीने के भीतर असाधारण रूप से स्वास्थ्य प्राप्त किया। इसी प्रकार, सूर्ययोगी बाबा उमाशंकर—जिनसे मुझे सूर्य योग सीखने का सौभाग्य मिला—ने सिद्ध किया कि बिना पारंपरिक भोजन और जल के भी केवल सूर्य की ऊर्जा से वर्षों तक जीवित रहना संभव है।
श्रीमद्भगवद्गीता 3.42 में कहा गया है –
"इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥"
भावार्थ: “इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है, और आत्मा सबसे श्रेष्ठ है।”
यह श्लोक हमें स्मरण दिलाता है कि सच्चा पोषण केवल शरीर और इन्द्रियों को तृप्त करने से नहीं आता, बल्कि बुद्धि और आत्मा को सशक्त करने से आता है।
बच्चे: अधिक उत्तेजित, अधिक भरे हुए, लेकिन अंदर से रिक्त
आज के युग में बच्चों को बहुत कुछ मिल रहा है—पर उनका आत्मबल, भावनात्मक स्थिरता और आध्यात्मिक विकास अक्सर उपेक्षित हो जाता है।
कक्षा से मिली एक सच्ची सीख
नासिक के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में वास्तु विभाग की प्रमुख के रूप में कार्य करते हुए मैंने नये छात्रों के लिए पर्सनालिटी डेवलपमेंट सेशंस आयोजित किए। एक बार एक छात्रा ने बताया कि उसने पाँच बार आत्महत्या का प्रयास किया है। कारण सुनकर हम स्तब्ध रह गए—न कोई बड़ा आघात, न कोई गंभीर दुर्घटना। कारण थे – एक बार पापा ने डायमंड रिंग नहीं दिलाई, एक बार उसकी गुड़िया जल गई।
उसके पिता ने कहा – “मैंने उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, वह एक राजकुमारी की तरह पली है।” तभी मुझे एहसास हुआ कि बिना अस्वीकार के पला बच्चा कभी मानसिक रूप से मजबूत नहीं बनता। बहुत अधिक देने से, हम अनजाने में उन्हें तोड़ते हैं, गढ़ते नहीं। इसे ही मैं “spoiled identity trap” कहती हूं—जहां बच्चा सोचता है कि जीवन हर बात में उसकी हाँ करेगा, और जब ऐसा नहीं होता, तो वह टूट जाता है।
वेदों की भूली हुई नींव
प्राचीन वेदों में 8 से 25 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए गुरुकुल प्रणाली थी—जहां अनुशासन, सेवा, सादगी और ज्ञान का जीवन होता था। "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव" केवल मंत्र नहीं थे, ये चेतना निर्माण की जिम्मेदारी की याद दिलाते थे।
मैंने स्वयं अपने संपन्न बचपन की कई धारणाओं को त्यागा है। आज मैं किसानों, गुरुकुलों और साधुओं के बीच रहती हूं। चूल्हे पर खाना पकाती हूं, शैम्पू, टूथपेस्ट, कॉस्मेटिक्स नहीं उपयोग करती, 8 वर्षों से एक भी ऐलोपैथिक दवा नहीं ली है। हाथ से पिसा हुआ भोजन, और रोज़मर्रा के काम ही मेरे व्यायाम हैं। इससे एक बात स्पष्ट हुई—हमें अपने बच्चों को दुनिया नहीं देनी है, उन्हें दुनिया का सामना करना सिखाना है।
भोजन से मुक्ति तक
सच्चा प्रेम इच्छाओं को तृप्त करने में नहीं, बल्कि उन्हें पार करने की शक्ति देने में है। अगर हम केवल स्वाद के लिए बच्चों को खिलाते हैं, तो हम उनकी आत्मा को उपेक्षित कर रहे हैं—जो अनुशासन, मौन और आंतरिक पोषण चाहती है।
प्राकृतिक, सात्विक भोजन ही असली औषधि है। जब हम प्रकृति को अपनाते हैं, चमत्कार संभव हो जाते हैं।
भविष्य के लिए एक मौन बीज
मेरे हृदय में एक सपना है—एक ऐसा स्थान जहाँ प्राचीन ज्ञान फिर से जीवित हो, एक गुरुकुल जैसी व्यवस्था, जहाँ शिक्षा, भोजन, और मूल्य प्रकृति के साथ तालमेल में निःशुल्क साझा किए जाएं। जहाँ बच्चे केवल शरीर से नहीं, मन और आत्मा से भी मजबूत बनें।
बच्चे को बोर होने दो। उसी बोरियत में वह सीखेगा—
पंछियों का संगीत सुनना,
हवा की थपकी को महसूस करना,
चींटियों की मेहनत को देखना,
पेड़ों से संवाद करना,
और सबसे महत्वपूर्ण—अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनना।
कोई ऐप या पुरस्कार इस जुड़ाव की जगह नहीं ले सकता।
अंत में –
क्या हम केवल शरीर को खिला रहे हैं, या उनके भाग्य को?
एक माँ की सच्ची भेंट है—ऐसा भोजन जो ऊर्जा दे, ऐसा वातावरण जो आत्मा को जगा दे, और ऐसा अनुशासन जो चरित्र को मजबूत बनाए।
—
मंजुश्री राठी
निदेशिका, ME Holistic Centre
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